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क्या युवाओं को राजनीति को एक वृत्ति (करियर) के रूप में देखना चाहिए

" लगभग  हर  एक  चीज  जो  महान  है  युवाओं  द्वारा  की  गयी  है| ."                                                                            - बेंजामिन  डिस्रेलि                    पूर्व ब्रितानी प्रधानमंत्री के उपर्युक्त विचार दर्शाते हैं की युवावस्था वह समय है जब व्यक्ति के पास महान परिवर्तनों को लाने की शक्ति होती है | युवा उस वायु के सामान है जो अपने वेग से समाज , राजनीति  और दुनिया को बदलने की क्षमता रखती है | युवाओं में वह ओज होता है जो उन्हें नए विचारों के प्रति सजग रखता है और उनके पास अतीत से सीखने की काबिलियत भी होती है |  जब युवा राजनीति में आते हैं तो नव परिवर्तन की धारा बहती है और नयी सोच का निर्माण होता है |             ...

श्रम बल में महिलाओं का कम और स्थिर भाग : एक विसंगति या आर्थिक सुधारों का परिणाम

                                  "किसी भी राष्ट्र की उन्नति या अवनति उसकी                                   स्त्रियों की उन्नति या अवनति पर निर्भर होती है | "                                                                                              - अरस्तु        अरस्तु का यह कथन दिखाता है की देश की महिलाएं देश के लिए क्या मायने रखती हैं | महिलाएं किसी भी देश की नींव होती है जिनपर परिवार से लेकर समाज तक की वृहत जिम्मेदारी होती है | महिलाएं बेटी , बहन, पत्नी और माँ के रूप में जहाँ पुरुषों को सहयोग देती हैं वहीँ वह समाज में नव पीढ़ी की रचनाकार और उस...

पर्यावरणीय चुनौतियाँ और भू राजनीति : पर्यावरण की रक्षा किस प्रकार की जाए ?

मानव के जीवन के लिए स्वस्थ शरीर और स्वास्थ्यवर्धक परिवेश की महती आवश्यकता है | हमारा पर्यावरण हमारे जीवन के लिए दशाएं देता है और इसको स्वस्थ रखना भी हमारा कर्त्तव्य है | हमारी संस्कृति में प्रकृति को माता का दर्जा दिया गया है क्यूंकि ये हमारा भरण पोषण करती है और हमारे सुख शांति के लिए नवीन सुन्दर दृश्य प्रदान करती है | प्राचीन काल से ही सभी सभ्यताओं में प्रकृति की प्रति मानवीय कर्त्तव्य का जिक्र किया गया है चाहे वह मेसोपोटामिया हो , हड़प्पा सभ्यता हो या फिर मिस्र की प्रच्चीन सभ्यता सभी में मनुष्य और प्रकृति के मध्य संबंधों का चिंत्रण मिलता है | आधुनिक मनुष्य अपने विज्ञान के कारण प्रकृति से दूर हुआ है और प्रगति के नाम पर उसने पर्यावरण को हानि पहुंचाई है | मनुष्य ने जैसे जैसे तरक्की की वैसे वैसे उसने अपने बल पर प्रकृति को विजित करना शुरू किया यह भूलकर की इस प्रक्रिया में वह अपने लिए ही संकटों को बुला रहा है | मनुष्य ने अपने अंधाधुन्द दोहन के छेत्र भी निर्धारति कर लिए और जब उसकी लालसा पूरी न हुई तो उसने युद्ध आदि के सहारे से दूसरों के छेत्रों पर कब्ज़ा शुरू कर दिया|राजनीति के खेल में ज्...

प्रोद्योगिकी पर अति निर्भरता मानव विकास को बढ़ावा देगी

मानव विकास की परिभाषा हमेशा से ही विचार विमर्श का विषय रही है | कुछ जानकार इसे देश की आर्थिक संवृद्धि से जोड़ते हैं तो कुछ इसे मानव की खुशहाली से मापते हैं | पैमाना जो भी हो पर विकास का मूल मंत्र यही है की मानव अपने जीवन में कितनी स्वतंत्रता का अनुभव करता है , वह अपने हित के लिए साधन जुटाने में कितना सम्पन्न है  और वह समय , परिस्तिथि , पर्यावरण आदि के आधार पर स्वयं को कितना अनुकूलित कर सकता है | यदि मानव के पास उपरोक्त शक्तियां और अधिकार हैं तभी सही मायने में उसे विकसित कहा जाना चाहिए | प्रोद्योगिकी की मानव विकास में अहम् भूमिका रही है |तकनीकी उन्नति के कारण ही आज असाध्य रोगों का इलाज संभव है , घर बैठे बैठे ज्ञान अर्जन हो सकता है , छण भर में लम्बी दूरियां तय करी जा सकती हैं, छुदा मिटाने हेतु पल भर में ही तैयार होने वाले व्यंजन आज हमारे पास हैं और यहाँ तक की भविष्य की गतिविधियों की गणना भी सुपर कंप्यूटर द्वारा करी जा रही हैं | तकनीकी अनुप्रयोग ने मानव के विकास में गति ला दी है परन्तु क्या अति निर्भरता से इसमें तेजी आएगी , इसके लिए उस मूल्य को समझाना भी आवशयक है जो हमने इस प्र...

सच्चा ज्ञान यह जान लेने में है कि आप कुछ नहीं जानते

सुकरात ने कहा था कि आप तभी सच्चे ज्ञान को पा सकते हैं जब आप किसी पूर्वाग्रह में न फसे हो। कुछ नया सीखने के लिए बहुधा पुरानी मान्यताओं से अलग सोचना ही पड़ता है। जब मनुष्य ये मान ले की उसने सब कुछ जान लिया है और नए ज्ञान की खोज करना बंद कर दे तो उसकी प्रगति वहीँ रुक जाती है। समय के साथ उसके ज्ञान पर धूल चढ़ जाती है और फिर नए समय से कदम न मिला पाने के कारण उस ज्ञान और व्यक्ति दोनों का ही आस्तित्व सन्कट में पड़ जाता है । प्रगति मनुष्य की हो, समाज की, विज्ञान की या फिर राज्य की वो इस बात पर ही टिकी होती है की पिछला कुछ भुलाया जाये और कुछ नया खोज जाये। जब आप यह मान लेते हैं कि आप के पास जो ज्ञान है वो सीमित है और समय के साथ वो खत्म जायेगा तब आप नए विचारों को खोजते हैं। बदलते समय के साथ आप स्वयं में बदलाव लाते हैं और फिर आप प्रगति करते हैं। जब आप यह मानने को तैयार हो जाएं की कोई भी ज्ञान शास्वत नहीं है , तभी आप नए समाज के निर्माता भी बनेंगे। नया ज्ञान न सिर्फ नयी सोच देता है बल्कि वह अच्छे/ बुरे, न्याय/ अन्याय आदि के मध्य भी नए विभाजन स्थापित करता है। सुकरात ने न्याय की परिभाषा करते हु...

हम आतंकवाद से लड़ नहीं सकते, हमें इसके साथ ही रहना होगा

11 सितम्बर 2001 की वह सुबह अमरीकी लोगों के लिए आम ही थी जब तक की एक अपहृत विमान वैश्विक व्यापार की प्रतीक वर्ल्ड ट्रेड सेंटर से नहीं टकराया था। कुछ देर बाद ही एक दूसरा विमान इसी से...

जो घर स्वयं में ही विभाजित हो वह खड़ा नहीं रह सकता |

घर एक ऐसी जगह है जहां परिवार रहते हैं । परिवार केवल इंसानों के साथ रहने से ही नहीं बल्कि उनके आपसी जुड़ाव से बनते हैं ।  आपस के प्यार भरे रिश्ते , नोक झोंक और एक दूसरे का साथ निभाने का एहसास यही है जो परिवार को परिवार और घर को घर बनता है । घर में अलग अलग विचारों के कारण मतभेद हो सकते हैं पर जब मतभेद बढ़ कर विभाजन का कारण बन जाते हैं तो घर टूटने लगते हैं । हमारे महाकाव्य गवाह हैं की कैसे रावण विभीषण के मतभेदों  के चलते लंका ध्वस्त हो गयी  और पांडव- कौरव विचार विभाजन से  कुरुक्षेत्र की भूमि सम्बन्धियों  के रक्त से पट गयी |परिवारों में जब मतभेद होते हैं तो परिवार की सोच परिष्कृत होती है और परिवारों के निर्णय एकांगी नहीं होते परंतु जब मतभेद विभाजन का रूप ले लें तो प्रगति रुक जाती है और परिवार दिशाहीन हो जाते हैं। परिवारों के संयोग से ही समाज बनते हैं और समाज में मतभेदों की संख्या परिवारों की संख्या के साथ साथ बढ़ती  जाती है। समाज में वैचारिक मतभेदों के साथ साथ लैंगिक, धार्मिक, जातीय, नस्लीय और आर्थिक मतभेद भी होते हैं पर यही...