पर्यावरणीय चुनौतियाँ और भू राजनीति : पर्यावरण की रक्षा किस प्रकार की जाए ?


मानव के जीवन के लिए स्वस्थ शरीर और स्वास्थ्यवर्धक परिवेश की महती आवश्यकता है | हमारा पर्यावरण हमारे जीवन के लिए दशाएं देता है और इसको स्वस्थ रखना भी हमारा कर्त्तव्य है | हमारी संस्कृति में प्रकृति को माता का दर्जा दिया गया है क्यूंकि ये हमारा भरण पोषण करती है और हमारे सुख शांति के लिए नवीन सुन्दर दृश्य प्रदान करती है | प्राचीन काल से ही सभी सभ्यताओं में प्रकृति की प्रति मानवीय कर्त्तव्य का जिक्र किया गया है चाहे वह मेसोपोटामिया हो , हड़प्पा सभ्यता हो या फिर मिस्र की प्रच्चीन सभ्यता सभी में मनुष्य और प्रकृति के मध्य संबंधों का चिंत्रण मिलता है | आधुनिक मनुष्य अपने विज्ञान के कारण प्रकृति से दूर हुआ है और प्रगति के नाम पर उसने पर्यावरण को हानि पहुंचाई है | मनुष्य ने जैसे जैसे तरक्की की वैसे वैसे उसने अपने बल पर प्रकृति को विजित करना शुरू किया यह भूलकर की इस प्रक्रिया में वह अपने लिए ही संकटों को बुला रहा है |

मनुष्य ने अपने अंधाधुन्द दोहन के छेत्र भी निर्धारति कर लिए और जब उसकी लालसा पूरी न हुई तो उसने युद्ध आदि के सहारे से दूसरों के छेत्रों पर कब्ज़ा शुरू कर दिया|राजनीति के खेल में ज्यादा से ज्यादा ताकत का मतलब ज्यादा से ज्यादा कब्जों पर हो गया और इसीलिए आज देशों के मध्य लड़ियों का प्रमुख कारण ससंसाधनों पर अधिकार को लेकर है | पर अब समय ने दूसरी ओर करवट ली है और अतीत में प्रकृति का किया गया दोहन आज संकट के रूप में उभर रहा है | इससे भू राजनीति की दिशा बदल रही है और जहाँ संघर्षों की बात होती थी अब वहां पर्यावरण रक्षा के लिए सहयोग की बात हो रही है |

१८वीं सदीं में विज्ञान के प्रसार के साथ साथ आद्योगिक क्रान्ति का आगमन हुआ जिससे सर्वत्र उत्पादन की होड़ सी लग गयी | पहले जहाँ उत्पादन उपयोग हेतु होता था वहीँ अब ये मुनाफा आधारित हो गया | उत्पादों हेतु कच्चा माल और बाजार की चाह में साम्राज्यवादी प्रसार शुरू हुए और देखते देखते पूरा विश्व आद्योगिक क्रांति का चित्र हो गया | आद्योगिक क्रांति ने जहाँ मानवीय सुख सुविधाओं को बढाया वहीँ उसने प्रकृति का दोहन भी किया | १९वीं सदी में प्रसिद्ध कवी विलियम वर्ड्सवर्थ ने अपनी कवितों में प्रकृति के दोहन के बारे में लिखना शुरू किया , परन्तु प्रगति की चमक में उनकी वाणी अनसुनी रह गयी | २० सदी के अंत तक दोहन के दुष्परिणाम सामने आने लगे और  तब सभी राज्यों का ध्यान पर्यावरण रक्षा की ओर गया |

२० वीं सदी के अंत तक कुछ पर्यावरण संकट स्पष्ट रूप में सामने आने लगे थे | इसमें सबसे बड़ा संकट सामने आया वैश्विक तापन के रूप में | बड़े उद्योगों , वाहनों तथा कोयला आधारित संयंत्रों से निकले उत्सर्जन के कारण वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड जैसी हरित गृह गैसों की मात्र बढ़ने लगी और इसके कारण धरा का उष्मन भी बढ़ने लगा | उष्मन बढ़ने के प्रभाव स्वरूप हिमनद पिघलने लगे , सागरों का ताल ऊँचा होने लगा, परितंत्रों की रचना टूटने लगी और कई साड़ी प्रजातियाँ विलुप्त होने लगी | सागर ताल बढ़ने से बांग्लादेश व मालदीव जैसे कुछ देशों के तो जलमग्न होने का संकट ही उत्पन्न हो गया |

कुछ नाजुक पारितंत्र जो सालों से अभेद्य थे वे भी वैश्विक तापन के चलते टूटने लगे है | प्रवाल भित्तियों में वैश्विक तापन के कारण आ रहे 'विरंजन ' संकट से पता चलता है की कैसे पर्यावरण को सँभालने वाले अवयव ही नष्ट हो रहे हैं | इसी उदहारण से हम पूरी एक प्रक्रिया को समझ सकते है , प्रवालभित्ति पर संकट से जल्प्लावकों में कमी आई है , जिससे छोटी मछलियाँ और फिर उनपर निर्भर बड़ी मछलियों की संख्या में कमी आई है |चूँकि मछली मानव आहार का भी हिस्सा है इसलिए समझा जा सकता है की कैसे प्रवाल भित्तियों पर संकट से मानव खाद्य सुरक्षा पर भी संकट आ सकता है |

अन्य जगहों पर भी परितंत्रों के नष्ट होने से तथा जैव विविधता पर संकट से विभिन्न दुष्प्रभावों की उत्पत्ति हुई है | आज बढ़ते प्रदुषण के कारण जल संकट उत्पन्न हो गया है तथा दुनिया की आधी आबादी के पास पीने हेतु साफ़ पानी भी नहीं है | वायु प्रदूषण के कारण दमे जैसे रोग बढ़ते जा रहे हैं | तेजी से पृथ्वी पर पड़ती अल्ट्रा वायलेट किरणें त्वचा कैंसर, अन्ध्पन आदि रोगों को बढ़ा रही हैं | इन सब संकटों के भूमिका में भू राजनीति में भी परिवर्तन देखे जा रहे हैं | भू राजनीति के परिवर्तन दो प्रकार के है | छेत्रीय रूप में जहाँ देश अपने संसाधनों की सुरक्षा हेतु आतुर हैं वहीँ वैश्विक रूप में वह सहयोग की बात करते हैं | ये विरोधाभासी सा प्रतीत होता है परन्तु पर्यावरण सरोकार की यह प्रमुख चिंता है की देशों का नजरिया अभी भी इस समस्या के प्रति सही नहीं है |

जब हम भू राजनीति को छेत्रीय रूप में देखते हैं तो हमे दक्षिण चीन सागर, आर्कटिक समुद्र , ससेंकाकू द्वीप जैसे मुद्दे दिखते हैं | इनमे देश अपने आस पास के संसाधनों के दोहन हेतु शक्ति का प्रयोग कर रहे हैं और रास्ट्रीय हित के नाम पर पर्यावरण से सम्बंधित मुद्दों की अनदेखी कर रहे हैं | चीन द्वारा दक्षिण चीन सागर पर प्रभुत्व को लेकर उठाया गया विवाद या फिर अरुणाचल के तवांग छेत्र पर कब्जे की मांग दिखाती है की आज भी भू राजनीति में देश अपने लिए महत्तम संसाधनों की चाह रखते हैं |

दूसरी ओर वैश्विक रूप में समाधान की भी बात करी जा रही है जो भू राजनीति का वर्तमान में प्रमुख छेत्र है | UNEP, COP ,आदि मंचों द्वारा देशों ने एकमत होकर पर्यवयन रक्षा हेतु कदम उठाने की पहल की है | २०१५ में संपन्न हुआ पेरिस जलवायु समझौता इस ओर एक बड़ा कदम है | इसमें भारत ने २०३० तक उत्सर्जन में ३३% कमी का कार्यक्रम रखा है  | अन्य देशों ने भी इस तरफ प्रभावी कदम उठाये हैं | बढ़ते पर्यावरण संकट के कारण न अब केवल वैश्विक तापन से सम्बंधित बल्कि जैव विविधता से सम्बंधित भी उपाय किये जाने लगे हैं | १९९२ का पृथ्वी शिखर सम्मलेन देशों की जैव विविधता की प्रति प्रतिबद्धता को स्पष्ट करता है | नागोया प्रोटोकॉल, कार्तेगेना प्रोटोकॉल  आदि उपाय जैविविधता से सम्बंधित हैं |

अभी तक जो भी कदम उठाये गए हैं वो पूर्ण रूप से प्रभावी नहीं सिद्ध हुए हैं क्यूंकि इनमे लिए गए निर्णय बाध्यकारी नहीं होते हैं | ये देशों की राजनीति व नेताओं पर भी निर्भर करता है की वह किस प्रकार के फैसले लेंगे और वैश्विक जनमत का कितना सम्मान करेंगे | हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में एक उमीदवार ने उद्योगपतियों को लोक-लुभावन नारे देते हुए कहा की वह राष्ट्रपति बनते ही ग्लोबल वार्मिंग पर चल रहे अमेरिकी कार्यक्रम को समाप्त कर देंगे  | पर्यावरण की रक्षा करते को ध्यान में रखते हुए यह कहा जा सकता है की वैश्विक नेताओं द्वारा दिखाया गया ऐसा व्यवहार न केवल पर्यावरण उपायों को रोकेगा बल्कि संकटों को और बढ़ा भी देगा| हमे स्वार्थ आधारित राजनीति से ऊपर उठाना होगा और राष्ट्रीय हित की जगह मानवीय हित को देखना होगा |

वर्तमान समय की मांग है ऐसी नयी प्रक्रियोयों को बढ़ावा दिया जाये जिससे बढ़ते पर्यवरण संकट कम हो | भू राजनीति का जोर अब सहयोग और समावेशिता पर होना चाहिए| 'सतत विकास लक्ष्य-२०१५' इस ओर एक बड़ा कदम है जिसमे वैश्विक रूप से पर्यावरण रक्षण की बात कही गयी है और देशों को विविध उपाय द्वारा प्रकृति की रक्षा हेतु उद्द्यत किया गया है | अब ने केवल सरकारों को बल्कि नागरिक समाज को भी बड़ी जिम्मेदारी निभानी है |गैर सरकारी संस्थाओं, स्कूलों, चर्च ,मंदिर , मस्जिद, मीडिया , राजनीतिक पार्टियाँ आदि हर एक को सहयोग करना होगा सरकार का जिससे वह पर्यावरण रक्षा के उपायों  को बढ़ावा दे सकें | भारत का चिपको आन्दोलन साक्षी है की किस प्रकार नागरिक समाज के सहयोग से पर्यावरण रक्षा हेतु कदम उठाये जा सकते हैं, इसलिए पर्यावरण रक्षा में नागरिक समाज को महती भूमिका में उतरना होगा |

आज भू राजनीति में सहयोग की आवश्यकता है जिससे हरित व्यवसाय , हरित तकनीक और हरित  जीवन को बढ़ावा मिले | सरकारों को पेटेंट नियमों में ढील देकर हरित प्रोद्योगिकी के हस्तान्तातरण को बढ़ावा देना चाहिए जिससे विकासशील देश विकास का वह मार्ग न अपनाये जो विकसित देशों ने अपनाया था | विकसित देशों की गलतियों से विकाशील देशों को सीखना चाहिए और अनुसन्धान को इस और प्रेरित करना चाहिए जिससे पर्यावरण हितेषी उत्पाद बनाए  जा सकें | उत्पादन सीमाओं को तय करना होगा और हरित उपभोग वाद को बढ़ावा देना होगा जिससे उपभोक्ता भी पर्यावरण हितेषी उत्पादों को अपनाये |

इस प्रकार हमने देखा की मानव ने अपने अतीत की गलतियों के कारण प्रकृति को बहुत नुक्सान पहुचाया है | भू राजनीति का प्रयोग देशों ने ज्यादा से ज्यादा संसाधनों पर कब्ज़ा ज़माने के लिए किया | पर अब जब पर्यवरण संकट सामने आ रहा है तो भू राजनीति में परिवर्तन देखे जा रहे हैं और देश सहयोग की दिशा में बढ़ रहे हैं | इसमें अभी पूर्णता सफलता नहीं मिली है और कुछ नेता अभी भी पर्यावरण की अनदेखी कर छोटे हितों को बढ़ावा देते हैं | जब तक हम भू राजनीति को मानवीय राजनीति में नहीं बदलेंगे और शक्ति को समन्वय से प्रतिस्थापित नहीं करेंगे तब तक पर्यवरण की पूरी रक्षा असंभव है | सभी देशों को पर्यावरण के प्रति एक जैसा नजरिया अपनाना होगा , उन्हें अपने नागरिकों के साथ दुसरे देशों के नागरिकों को भी अपना समझना होगा तभी वो एक सफल कार्यक्रम बना पाएंगे | समय की दरकार है है की विश्व गाँधी जी के निम्न कथन को ध्यान में रखते हुए सहयोग के रास्ते पर आगे बढे और पुनः पर्यावरण को स्वस्थ बनाये |

"आप जो भी फैसला लें उसमे ये परीक्षण करें की इससे गरीब से गरीब व्यक्ति को क्या लाभ मिलेगा , यदि इससे गरीब व्यक्ति को फायदा न हो तो ये फैसला सही नहीं होगा " |

  

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